नई दिल्ली:तिब्बती महिला संगठन दिल्ली के प्रेस क्लब आफ इंडिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस किया जिसमें उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ, सांसद गण विश्व नेतागण और तिब्बती समर्थक गुट वैश्विक तिब्बत समर्थक गुटों से अपनी मांगों पर समर्थन मांगा.

गौरतलब है कि तिब्बती राष्ट्रीय विद्रोह की 62 वी जयंती मना रहे हैं इस मौके पर तिब्बती महिला संगठन एकरूपता के साथ अपने पूर्व भाग पर पहले तिब्बती भाइयों और बहनों से आह्वान किया साथ ही उन सभी बहादुर नारियों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित किया जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपनी जान को निछावर कर दिया।
12 मार्च 1959 को तिब्बती विद्रोह दिवस के तौर पर दिवस के 1 दिन बाद हजारों की संख्या में तिब्बती महिलाएं पोटाला प्रसाद के सम्मुख ल्हासा के द्रिवु युलकाई मैदान में इकट्ठा हुई थी। चीनी दमन के विरुद्ध एक जुलूस का आयोजन किया गया था जिसमें प्रारंभिक तौर पर बहादुर महिलाएं जैसे गुरतेंग कुनसंग, गैलिंगशर छोजीव ,डोल्मा पेम्पा समेत और भी लोग शामिल हुए ।

इस दौरान बहुत से महिला नेत्रियो को जेल जाना पड़ा अन्य कई महिलाओं के साथ क्रूरता हुई, इस प्रकार के दमनकारी कृत उनके साहस को परास्त नहीं कर सके । ठीक 10 साल बाद 1969 में संस्कृत सांस्कृतिक क्रांति के दौरान गुरतेंग कुलसंग ने कुख्यात जेल में अपनी अवज्ञता जारी रखा। सन 1970 में 15 कैदियों के साथ उन्हें फांसी दे दी गई, इसके अलावा नेवमो अनि त्रिचले छोदेन जो कि नोयमा विद्रोह की नेत्री थी उनको जनता के सामने शेरा मठ के सामने फांसी दे दिया गया था।
तिब्बत के भीतर मानवाधिकारों की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है चीनी सरकार ने केवल तिब्बतियों के राजनैतिक और धार्मिक अधिकारों का हनन कर रही है बल्कि तिब्बती पठार के नाजुक पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा रही है। साल 2016 से लेकर 2019 में शी जिनपिंग के नेतृत्व के अधीन लारुंगर व यावेन्गर में बहुत सी भिक्षुणियो को रिहायशी स्थान से या तो निकाल दिया गया या फिर उनके रिहायशी स्थान कई बार तोड़े गए। राज्य द्वारा भिक्षुणियो बंदी बना लिया गया और उन्हें वापस अकादमी में शिक्षा के लिए नहीं भेजा गया इसके अलावा जबरन नए सिरे से देश भक्ति से संबंधित संस्थानों में हाजिर किया गया।
शी जिनपिंग के नेतृत्व में तिब्बत में मानवाधिकारों का हनन बलपूर्वक नीति व पहचान की निगरानी के तहत निचले स्तर तक चला गया ।
1959 से जब से ल्हासा मे तिब्बती महिला संगठन का गठन हुआ है इसने बिना रुके हुए निरंतर तिब्बत के राजनीतिक संघर्ष तिब्बती संस्कृति की बेहतरी के लिए प्रयास किया निर्वासन में 10 सितंबर 1984 को तिब्बती महिला संगठन का गठन किया गया इसका सशक्तिकरण हुआ इसकी पहचान तिब्बत के बाहर एकमात्र गैर सरकारी महिला संगठन के तौर पर हुई है

तिब्बत के प्रति संघर्ष में रंजीत अपनी बराबर की हिस्सेदारी अदा करने की आजादी के प्रति संघर्ष में तिब्बती महिला संगठन पूरे जोश के साथ खड़ा है जिसने निर्वासन में रह रहे तिब्बती महिलाओं में सृजनात्मक सोचते पनपे, जिसके लिए सामुदायिक, शिक्षा प्रकाशन एवं शैक्षणिक कार्यक्रम सभी क्षेत्रीय इकाइयों को सम्मिलित करते हुए अपने दायित्व निभा रही हैं इसी से ही सामुदायिक उत्थान में इसकी पहचान है।…
प्रेस कांफ्रेंस कर अपनी मांगो को मीडिया के सामने रखा:
अब आपको बताते हैं कि उनकी मागे क्या थी-
1.चीन के ऊपर या दबाव बनाया जाए जिससे कि 14वें दलाई लामा के प्रतिनिधियों से वार्ता शुरू हो सके।
2. संयुक्त राष्ट्र कमेटी से निवेदन है कि जबरन बंदी बनाए हुए श्री पश्चिम लामा और अन्य राजनैतिक बंदियों को बिना शर्त रिहा किया जाए।
3. चीन का विरोध किया जाए ताकि 14वें दलाई लामा के अगले अवतार को घोषित करने में चीन की मंशा को नकारा जा सके।
4. तिब्बत के भीतर मानवाधिकार स्थिति को चीन बेहतर बनाएं।

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